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रविवार, 15 फ़रवरी 2015

== आप ज्योतिष हे == या बना दिए गए हे \\ आप टैरो रीडर हे \\

== आप ज्योतिष हे == या बना दिए गए हे \\ आप टैरो रीडर हे \\ 
=== आप बाबा हे या बना दिए गए हे \\ आप हर बात पहले से जानते हे \\ आप मुसीबत के मारे ज्योतिष हे \\
=== इस मार्ग में अनेको से मिले अनेको को जानते हे , और अनेको केवल ज्ञानी अपने जीवन अ दुर्भाग्य भोगने हेतु ही ज्ञानी बने हे \\ 
=== अनेको मुसीबत के मारे हे जो ज्योतिषी बने हे \\ अनेको को तंत्र क्रियावो ने धार्मिक बना दिया हे \\
=== अनेको को मज़बूरी ने \\ अनेको को शत्रुवो ने \\ मगर ज्ञानी होने का नशा चढ़ा इस तरह की वह उसमे ही रम गए और अब यही अच्छा लगता हे \\ अनेको दुश्मन के तंत्र प्रयोग से घरबार छोड़कर साधु बने हे अनेको तंत्र प्रयोग से परिवार में होते हुवे भी परिवार दे दूर और दुखी हे \\
=== वास्तविकता तो यह हे की कुछ , बाधक दशवों में , बाधक के कारन या ईस्ट पूजा ज्यादा करने या शिद्धी पूजा ज्यादा करने से कार्यव्यवहार कर न सके या अस्त गृह की दःसा के कारण सभी कुछ चोपट होने से ज्ञानी बने \\ 
=== या आपके अस्त शनि की धशा के कारन आप ज्योतिषी या ज्ञानी बने या , फिर गुरु या बुध के कारन , अनेको प्रसिद्ध जो देखने को चमत्कारी मिले हे वह सभी मज़बूरी के मारे ही मिले हे \\ 
=== अनेको तो सप्तमेश के अस्त , पीड़ित , होने से साधक बने हे यह सप्तमेश का दुःख अनेको को ज्ञानी बना देता हे \\ 
=== कुछ पर बाधक के समय में तंत्र प्रयोग होता हे जिसके कारण वह व्यक्ति , चमत्कारी ज्योतिष हो जाता हे अनेको को प्रेत बढ़ा हो जाती हे अनेको को गन्धर्व लग जाते हे , और यही प्रेत बढ़ाये व्यक्ति के कारोबार को चोपट करने के बाद उसको , बर्बाद करने हेतु ज्ञानी बनाती हे आश्चर्य की बात हे की वह व्यक्ति उसी में मस्त हो जाता हे उसको मालूम ही नहीं होता हे की यह दुर्भाग्य हे जिसको वह भोग रहे हे \\

=== इस श्रेणी में वह विद्वान पंडित नहीं आते हे जो पद लिखकर इस कार्य को व्यवसाय या जीविकोपार्जन हेतु अपनाते हे , किन्तु वह भी सिद्धी के चक्कर में तो पड़ते ही हे इसको वह ईस्ट साधना कहते हे \\
=== कुछ लोग इसको गुरु कृपा भी कहते हे \\ 
=== वह व्यक्ति जो दूसरों को ठीक कर रहा हे वह यहीं नहीं जनता हे की वह स्वयं ही बढ़ा से पीड़ित हे वह ठीक हो सकता हे \\ अनेको महिलाये भी इसी चक्कर में हे और पुरुष भी , बस व्यर्थ ही इधर उधर घूमना और भविष्यवाणी करना और सबको कहते फिरना की देखो यह हमने तो पहले ही कहा था , पहले ही सब बताया था , यह भविस्यवाणी की बीमारी ही हे \\ इसका सबसे बड़ा कारन दुःख का यहीं हे की आपको धर्म कार्य करना चाहिए और आप दूसरों से धाम कार्य के नाम पर पैसे लेने लग जाते हे और किसी को भगवन ने दुःख उसके कर्म के अनुसार ही दिया हे उसको आप दूर करने का कहते हे और जीविका का साधन बनाते हे यहीं से आपके दुःख का मार्ग आरम्भ हो जाता हे \\ 
== कर्मकांडी कर्म कांड करवाता हे , 
=== आस्चर्य तो यह हे की वह जिसको जो बताता हे उससे उसको लाभ होता हे और उस बताने वाले ज्ञानी का नुकसान ही होता हे किन्तु अनुभव की कमी से ज्ञात नहीं होता हे \\ 

== आप ठीक हो सकते हे , आप धर्म के मार्ग पर वापस आ सकते हे , आपको आगे की सोचना हे , आप वास्तविक ज्ञानी होसकते हे आपके ऊपर किया गया प्रयोग दूर हो सकता हे , आप महान भी हो सकते हे , आपके परिवार में भी शुख और आपको भी शुख मिल सकता हे , कोई आवशयक नहीं हे की नकली ब्रह्मचर्य को पीला आप और अपने सहयोगी को भी दुखी करें , पीटीआई के ब्रह्मचर्य का दुःख पत्नी को हे और पत्नी के इस कार्य का दुःख पति को हे इसको आप जाने \\ 
== आप की शक्ति और विस्मित कर सकती हे आप की शक्ति में चमत्कार हो सकते हे \\ 
== आप इस रह में अच्छे से आगे भी बाद सकते हे , 
== आदि लगता हे की यहीं हे और व्यापर को छोड़कर सभी कुछ तबाह होने से ही आप इस कार्य में आए हे तो फिर आपको यह कार्य करना चाहिएगा \\ 
=== जब भी अमावस्या पर्व हो , कोई ग्रहण का पर्व हो , या कोई भी पुण्यदायी मुहूर्त स्नान का हो तब आप ओम्कारेस्वर तीर्थ स्थल पर इस समय जाकर मामलेस्वर ज्योतिर्लिंग और ओम्कारेस्वर ज्योतिर्लिंग के मध्य में बने नर्मदा के घाट पर स्नान करें माँ नर्मदा और भगवन शिव जी के आशीर्वाद से आपको पुण्य स्वरूप ज्ञान और सफलता और तंत्र प्रयोगे से रक्षा होगी \\
== आपको घाट पर प्रातः या सुबह के समय ७=७ डुबकियां दो बार लगाना हे और तर्पण स्थानीय पंडित जी से करवाना हे जो पंडित घाट पर हो उससे ही \\ पानी को लोटे में डालकर स्नान नहीं करना हे नदी में खड़े होकर आपको ७ डुबकियां लगाना हे जिसमे की आप पूरी तरह से पानी के अंदर हो जाये इस तरह ७ बार करना हे और फिर कुछ समय ठहर कर फिर ७ डुबकी और लगाने हे फिर शिवजी का अभिषेक करे या यथा संभव पूजा जो आपसे बन सके करें \\ यह करने से जो भी बाधक या बढ़ा आपके तरक्की की रह रोक रही हे वह दूर हो जाएगी और आप अपना वास्तविक जीवन जी सकेंगे \\ किसी की अधीनता के जीवन से मुक्ति नभी मिलेगी \\== हो सकता हे की किसी को यह पड़कर बुरा लगे और उसका ज्ञान जाग्रत हो और उसको यह मिथ्या लगे वह सज्जन इस कार्य से दूर रहे और हमें क्षमा करने == घमंड ज्ञान को खा जाता हे =09926077010= और शक्ति विद्या को = धन नम्रता को खा जाता हे == किन्तु ज्ञान जो नकली हो वह तो सर्वस्व ही कहाजाता हे == राम राम

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

santan gopal - strot -सन्तानगोपाल स्तोत्र - सन्तानगोपाल मूल मन्त्र- संतान बाधा है तो वह निम्न मंत्र का जप व स्त्रोत्र का पाठ करे



santan gopal - strot - -- santan nhin hone par pryog karen 09926077010
----- iska pryog svyam nhin kar sake to -- kisi brahman se apne gharpar avashya hi karvaye \\
==== jinhe uttm santan yogy santan -- nam vardhan karne vali santan ki kamna ho vah dampatti dono milkar iska nitya 5 path subah or sham ko snan kane ke paschat pujan - kar hi nity pade -- bhut hi achche parinam samne aayenge \\

यदि किसी को संतान बाधा है तो वह निम्न मंत्र का जप व स्त्रोत्र का पाठ करे===सन्तानगोपाल स्तोत्र====
।। सन्तानगोपाल मूल मन्त्र ।।

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
सन्तानगोपालस्तोत्रं
श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् ।
सुतसंप्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ।।१।।
नमाम्यहं वासुदेवं सुतसंप्राप्तये हरिम् ।
यशोदाङ्कगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम्।। २ ।।
अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।
नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा ।। ३ ।।
गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम् ।
पुत्रसंप्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुङ्गवम् ।। ४ ।।
पुत्रकामेष्टिफलदं कञ्जाक्षं कमलापतिम् ।
देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम ।। ५ ।।
पद्मापते पद्मनेत्रे पद्मनाभ जनार्दन ।
देहि मे तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते ।। ६ ।।
यशोदाङ्कगतं बालं गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।
अस्माकं पुत्र लाभाय नमामि श्रीशमच्युतम् ।। ७ ।।
श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिर्हरणाच्युत ।
गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन ।। ८ ।।
भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।। ९ ।।
रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा ।
भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गतः ।। १० ।।
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ११ ।।
वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। १२ ।।
कञ्जाक्ष कमलानाथ परकारुणिकोत्तम ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। १३ ।।
लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। १४ ।।
कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।
नमामि पुत्रलाभार्थ सुखदाय बुधाय ते ।। १५ ।।
राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे कवे ।
तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ।। १६ ।।
अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ।। १७ ।।
श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।। १८ ।।
अस्माकं पुत्रसंप्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।
रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।। १९ ।।
वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।
पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ।।२० ।।
डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ।। २१ ।।
नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।
कमलनाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ।। २२ ।।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ।। २३ ।।
यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनं ।
वन्देऽहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ।। २४ ।।
नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।
रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ।। २५ ।।
पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।
अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ।। २६ ।।
गोपाल डिम्भ गोविन्द वासुदेव रमापते ।
अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ।। २७ ।।
मद्वाञ्छितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।
मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ।। २८ ।।
याचेऽहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसंपदम्।
भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ।। २९ ।।
आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।
अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ।। ३० ।।
वन्दे सन्तानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।
अस्माकं पुत्रसंप्राप्त्यै सदा गोविन्दमच्युतम् ।। ३१ ।।
ॐकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।
क्लींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ।। ३२ ।।
वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।
देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ।। ३३ ।।
राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।
समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ।। ३४ ।।
अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।
देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ।। ३५ ।।
नन्दपाल धरापाल गोविन्द यदुनन्दन ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।। ३६ ।।
दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।
गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ।। ३७ ।।
यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।
देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ।। ३८ ।।
अस्माकं वाञ्छितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।
भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ।। ३९ ।।
रमाहृदयसंभारसत्यभामामनः प्रिय ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।। ४० ।।
चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।
अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ।। ४१ ।।
कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।
देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ।। ४२ ।।
देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।
समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ।। ४३ ।।
भक्तमन्दार गम्भीर शङ्कराच्युत माधव ।
देहि मे तनयं गोपबालवत्सल श्रीपते ।। ४४ ।।
श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ।।४५ ।।
जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।
वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ।। ४६ ।।
श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ४७ ।।
दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ४८ ।।
गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ४९ ।।
श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।
मत्पुत्रफलसिद्ध्यर्थं भजामि त्वां जनार्दन ।। ५० ।।
स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखांबुजं विलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलाङ्गम् ।
स्पृशन्तमन्यस्तनमङ्गुलीभिर्वन्दे यशोदाङ्कगतं मुकुन्दम् ।। ५१ ।।
याचेऽहं पुत्रसन्तानं भवन्तं पद्मलोचन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ५२ ।।
अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।
शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ।। ५३ ।।
वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।
कुरु मां पुत्रदत्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ।। ५४ ।।
कुरु मां पुत्रदत्तं च यशोदाप्रियनन्दनम् ।
मह्यं च पुत्रसन्तानं दातव्यंभवता हरे ।। ५५ ।।
वासुदेव जगन्नाथ गोविन्द देवकीसुत ।
देहि मे तनयं राम कौशल्याप्रियनन्दन ।। ५६ ।।
पद्मपत्राक्ष गोविन्द विष्णो वामन माधव ।
देहि मे तनयं सीताप्राणनायक राघव ।। ५७ ।।
कञ्जाक्ष कृष्ण देवेन्द्रमण्डित मुनिवन्दित ।
लक्ष्मणाग्रज श्रीराम देहि मे तनयं सदा ।। ५८ ।।
देहि मे तनयं राम दशरथप्रियनन्दन ।
सीतानायक कञ्जाक्ष मुचुकुन्दवरप्रद ।। ५९ ।।
विभीषणस्य या लङ्का प्रदत्ता भवता पुरा ।
अस्माकं तत्प्रकारेण तनयं देहि माधव ।। ६० ।।
भवदीयपदांभोजे चिन्तयामि निरन्तरम् ।
देहि मे तनयं सीताप्राणवल्लभ राघव ।। ६१ ।।
राम मत्काम्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद ।
देहि मे तनयं श्रीश कमलासनवन्दित ।। ६२ ।।
राम राघव सीतेश लक्ष्मणानुज देहि मे ।
भाग्यवत्पुत्रसन्तानं दशरथप्रियनन्दन ।
देहि मे तनयं राम कृष्ण गोपाल माधव ।। ६४ ।।
कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शङ्कर ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।। ६५ ।।
गोपबाल महाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।। ६६ ।।
दिशतु दिशतु पुत्रं देवकीनन्दनोऽयं
दिशतु दिशतु शीघ्रं भाग्यवत्पुत्रलाभम् ।
दिशतु दिशतु शीघ्रं श्रीशो राघवो रामचन्द्रो
दिशतु दिशतु पुत्रं वंश विस्तारहेतोः ।। ६७ ।।
दीयतां वासुदेवेन तनयोमत्प्रियः सुतः ।
कुमारो नन्दनः सीतानायकेन सदा मम ।। ६८ ।।
राम राघव गोविन्द देवकीसुत माधव ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।। ६९ ।।
वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ।। ७० ।।
ममाभीष्टसुतं देहि कंसारे माधवाच्युत ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ।।७१ ।।
चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ।।७२ ।।
विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।
देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ।। ७३ ।।
नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।
मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ।। ७४ ।।
भगवन् कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।
देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गतः ।। ७५ ।।
स्वामिंस्त्वं भगवन् राम कृष्न माधव कामद ।
देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गतः ।। ७६ ।।
तनयं देहिओ गोविन्द कञ्जाक्ष कमलापते ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ।।७७ ।।
पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्न जनक प्रभो ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ।। ७८ ।।
शङ्खचक्रगदाखड्गशार्ङ्गपाणे रमापते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ७९ ।।
नारायण रमानाथ राजीवपत्रलोचन ।
सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ।। ८० ।।
राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।
रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ।। ८१ ।।
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।। ८२ ।।
मुनिवन्दित गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ८३ ।।
गोपिकार्जितपङ्केजमरन्दासक्तमानस ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ८४ ।।
रमाहृदयपङ्केजलोल माधव कामद ।
ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ।। ८५ ।।
वासुदेव रमानाथ दासानां मङ्गलप्रद ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ८६ ।।
कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ८७ ।।
पुत्रप्रद मुकुन्देश रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ८८ ।।
पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ८९ ।।
दयानिधे वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ९० ।।
पुत्रसम्पत्प्रदातारं गोविन्दं देवपूजितम् ।
वन्दामहे सदा कृष्णं पुत्र लाभ प्रदायिनम् ।। ९१ ।।
कारुण्यनिधये गोपीवल्लभाय मुरारये ।
नमस्ते पुत्रलाभाय देहि मे तनयं विभो ।। ९२ ।।
नमस्तस्मै रमेशाय रुमिणीवल्लभाय ते ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।। ९३ ।।
नमस्ते वासुदेवाय नित्यश्रीकामुकाय च ।
पुत्रदाय च सर्पेन्द्रशायिने रङ्गशायिने ।। ९४ ।।
रङ्गशायिन् रमानाथ मङ्गलप्रद माधव ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ।। ९५ ।।
दासस्य मे सुतं देहि दीनमन्दार राघव ।
सुतं देहि सुतं देहि पुत्रं देहि रमापते ।। ९६ ।।
यशोदातनयाभीष्टपुत्रदानरतः सदा ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।।९७ ।।
मदिष्टदेव गोविन्द वासुदेव जनार्दन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।। ९८ ।।
नीतिमान् धनवान् पुत्रो विद्यावांश्च प्रजापते ।
भगवंस्त्वत्कृपायाश्च वासुदेवेन्द्रपूजित ।। ९९ ।।
यःपठेत् पुत्रशतकं सोऽपि सत्पुत्रवान् भवेत ।
श्रीवासुदेवकथितं स्तोत्ररत्नं सुखाय च ।। १०० ।।
जपकाले पठेन्नित्यं पुत्रलाभं धनं श्रियम् ।
ऐश्वर्यं राजसम्मानं सद्यो याति न संशयः ।। १०१ ।।
09926077010 -- samajh nhin aane par aap kisi yogy pandit se iska vidhan samjhle jo ki sthaniy ho usse samne baithkar -- fir aap svyam bhi kar sakte he == kintu aarambh me aap kisi bhi parichit ko bulakar hi sampann kare == taki apka samy - sharm or pesa tinon ki barbadi na ho oa parinam uttm aaye \\