laxmi puja लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
laxmi puja लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 1 नवंबर 2015

laxmi puja deevali puja muhurta pushya nakstra दीवाली पूजन , व्यापर वृद्धि हेतु लक्ष्मी पूजा 2015

laxmi puja  deevali puja  muhurta  pushya nakstra 

=== दीवाली पूजन == व्यापर वृद्धि हेतु = लक्ष्मी पूजा और = शिव मेहता --09926077010

--- पुष्य योग मंगलवार को खरीदने के हे किन्तु इस दिन उधार नहीं कुछ खरीदे --- और उधार खरीदना ही हे तो फिर आप लोग सोमवार को ही रात्री 8 .30 पश्चात लगने वाले पुष्य नक्षत्र में ही खरीदे , मंगल वार के पुष्य में लिया उधार आप चूका नहीं सकेंगे \\ आगे आपकी मर्जी == 09926077010
-----सर्वप्रथम बहीखाता (चोपड़ा) निर्माण या खरीदने के लिए शुभ मुहूर्त---
 -- दिनांक 02 नवम्बर 2015 सोमवार -- रात्री 08 .40  बाद से सोम पुष्य का आगमन इस समय से चांदी के स्टाकिस्ट और खरीददार चांदी खरीदे और दुकानो हेतु चोपड़े भी खरीदे  खरीद - शुभ नक्षत्र सुयोग।।
--- दिनांक 03  नवम्बर  2015  मंगलवार  पुष्यामृत  योग -- व्यापरिक चोपड़े और घरेलु सामग्री खरीदे खरीदी का मुहूर्त किन्तु इस दिन उधारी में कुछ नहीं कहरीदे नहीं तो बहुत दिनों तक भी खर्ज चूका नहीं पावोगे === जिन्हे उधर ही खरीदना हे वह सोमवार को रात्रिकाल के पुष्य योग में वाहन किस्तों में खरीदे \\ 09926077010
.--दिनांक 06 नवम्बर 2015 (शुक्रवार) सिद्धियोग।।
.--दिनांक 08 नवम्बर 2015 (रविवार) सर्वार्थ सिद्धियोग, अमृत सिद्धियोग, 
.--दिनांक 09 नवम्बर 2015 (सोमवार) धनतेरस सुयोग।।
.--दिनांक 11 नवम्बर 2015 (बुधवार) दीपावली शुभ सुयोग।।
============================================================
पूजन के विशेष मुहूर्त---
धन तेरस (09 नवम्वर 2015,सोमवार) को--कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी रहेगी।। इस दिन कुबेर पूजन ,यम दीप दान एवम् श्री पूजन के लिए सायं 5 बजकर 45 मिनट से शाम को 8 बजकर 11 मिनट तक का समय उत्तम हैं।।
============================================================
दीपावली पर श्री लक्ष्मी पूजन--(चौघड़िया अनुसार)--
इस वर्ष 11 नवम्बर 2015 (बुधवार) को कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या को श्री महालक्ष्मी पूजा दीपोत्सव हैं।।
इस दिन गादी स्थापना, कलम दवात संवारने हेतु प्रातः 6 बजकर 55 मिनट से 9 बजकर 30 मिनट तक लाभ अमृत का चौघड़िया रहेगा।।
सुबह 11 बजे 12 तक शुभ का चौघड़िया रहेगा।।
दोपहर में 3 बजकर 5 मिनट से 4 बजकर 25 मिनट तक चल का चोघड़िया रहेगा।।
ओर शाम को 4 बजकर 25 मिनट से 5 बजकर 45 मिनट तक लाभ का चौघड़िया रहेगा।।
शाम को 7 बजकर 25 मिनट से 9 बजकर 5 मिनट तक लाभ का चौघड़िया रहेगा।।
रात्रि में 9 बजकर 5 मिनट से 10 बहकर 45 मिनट तक अमृत का चौघड़िया रहेगा।।
============================================================
दीपावली पूजन (स्थिर लग्न अनुसार)---
इस वर्ष 11 नवम्बर 2015 (बुधवार) को रात्रि 11 बजकर 15 मिनट तक कार्तिक कृष्ण अमावस्या रहेगी।। लक्ष्मी पूजन प्रदोष युक्त अमावस्या में स्थिर लग्न एवम् स्थिर नवांश में किया जाना उत्तम रहता हैं।।
अतः रात्रि 6 बजकर 10 मिनट से 6 बजकर 20 मिनट तक वृषभ एवम् स्थिर नवांश कुंभ में तथा रात्रि 7 बजकर 25 मिनट से 7 बजकर 40 मिनट तक वृषभ लग्न और सिंह नवांश पूजा का श्रेष्ठ समय रहेगा।।
स्थिर लग्न अनुसार श्री पूजन ---
वृषभ लग्न--शाम को 6 बजे से 7 बजकर 50 मिनट तक।।
मिथुन लग्न--शाम को 7 बजकर 50 मिनट से 10 बजकर 10 मिनट तक रहेगा।।
कुम्भ लग्न-- दोपहर में 1 बजकर 30 मिनट से दोपहर 3 बजे तक रहेगा।।
निशिथ काल-- रात्रि 11 बजकर 55 मिनट से मध्यरात्रि 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा।।
सिंह लग्न-- मध्यरात्रि (अर्धरात्रि) में 12 बजकर 32 मिनट से 2 बजकर 50 मिनट तक रहेगा।।
============================================================
प्रदोष काल में पूजन मुहूर्त---
11 नवम्बर 2015 (बुधवार) को सायं 5 वजकर 5 मिनट से रात्रि 7 बजकर 30 मिनट तक प्रदोष काल में पूजन कार्य शुभ रहेगा।।
==============================
इस वर्ष दीपावली 11 नवम्बर 2015 ( बुधवार) को मनाई जायेगी।। इस दिन स्वाति नक्षत्र रहेगा।। जिसका करके ग्रह शुक्र हैं।। इस दिन चंद्रमा तुला राशि में रहेगा वृद्धि होगी चाँदी , सूत , रुई की याने मंदी।। 
इस दिन पूजा के समय माँ लक्ष्मी जी का मुख नेऋत्य में रखे  और अपना मुंह ईशान कोण में रखें।।
विशेष लाभ हेतु-- 
माता लक्ष्मी जी को केसरिया धागे में बनी1008 मखाने की माला अर्पित करें।। पूजन के इसका प्रसाद सभी परिजन ग्रहण करें।। या 108  कमल गट्टे की माला पहनाये ||
लक्ष्मी जी को कांसी की थाली में बिठाएँ।। या बन सके तो चांदी की थाली में ||
लक्ष्मी जी को केसर, और गोलोचन का तिलक लगाएं।।
लक्ष्मी जी की संभव हो सके तो चांदी की प्रतिमा को ही पूजन में प्राथमिकता दे ||
लक्ष्मी जी के स्थायित्व हेतु आप साथ में श्री यन्त्र का भी पूजन कर स्थापित करें || 
लक्ष्मी जी को स्वेत पलाश की पादुकाएं अर्पित करें ||
लक्ष्मी जी को स्वेत पलाश के पुष्प सूखे अर्पित करे इससे लक्ष्मी स्थिर रहती हे ||
लक्ष्मी जी का पीले  रंग के ऊनि आसान पर बैठकर पूजन करें।।
लक्ष्मी जी के स्थायित्व हेतु आप धनवृद्धि भूतकेशी भी अभिमंत्रित करें यह लक्ष्मी को आकर्षित करती हे ||
लक्ष्मी जी के दायें तरफ पीतल के बर्तन में देशी घी का दीपक जलाकर चीनी (शक्कर) डालें।।
लक्ष्मी जी के बाएं तरफ आंवले के तेल का दीपक (मिटटी का) जलाएं।।
लक्ष्मी जी के साथ परिवार में कलह होता हो या परिवार में पुरुष सदस्यों की कमी हो या पुरुष सदस्यों की अ समय ही मृत्यु या एक्सीडेंट होने से नुकसान हो तो आप लक्ष्मी जी के साथ ही एक स्वेतार्क श्री गणेश प्रतिमा का भी पूजन कर घर में स्थापित करें || 09926077010 
लक्ष्मी जी की कामना और प्राप्ति जो चाहते हो वह किसी भी महिला का अपमान न करे और अपनी पत्नी का तो भूलकर भी नहीं और न ही परिवार की स्त्रियों का अपमान करे , उन्हें यथा संभव वस्त्र और धन देकर संतुष्ट रखे ||
लक्ष्मी जी सदेव भंडार भरा रखे इस हेतु साथ ही अन्नपूर्णा जी की भी पूजा या उनके स्त्रोत्र का पाठ करें ||
माता लक्ष्मी को घर में बनी केसर वाली और मखाने डली खीर और मुंग की दाल के हलवे का भोग लगाएं।। पूजन के पश्चात् अगले दिन सभी परिजन इसे ग्रहण करें।। बुद्धि ठीक रहेगी और परिवार में एकता बढ़ेगी।।
माता लक्ष्मी को पिपरमेंट,गुलकंद और वर्क लगा पान (बिना चुना लगा) अर्पण करना ना भूलें।।
इसके फलस्वरूप आपका यश,वैभव और समृद्धि दिनोदिन बढती जायेगी।। 09926077010

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

9 औषधियों में विराजती है नवदुर्गा ,navdurga ke nav rup

इन 9 औषधियों में विराजती है नवदुर्गा ,navdurga ke nav rup , navratree ,

मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात का जीमें उपलब्ध वे औषधि‍यां, जिन्हें मां दुर्गा के विभि‍न्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है। नवदुर्गा के नौ औषधि‍ स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया और चिकित्सा प्रणाली के इस रहस्य को ब्रह्माजी द्वारा उपदेश में दुर्गाकवच कहा गया है।
ऐसा माना जाता है कि यह औषधि‍यां समस्त प्राणि‍यों के रोगों को हरने वाली और और उनसे बचा रखने के लिए एक कवच का कार्य करती हैं, इसलिए इसे दुर्गाकवच कहा गया। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जीवन जी सकता है। आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है -
1 प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़ - नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकार की समस्याओं में काम आने वाली
औषधि‍ हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है।
इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है।
पथया - जो हित करने वाली है।
कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।
अमृता - अमृत के समान

हेमवती - हिमालय पर होने वाली।
चेतकी -चित्त को प्रसन्न करने वाली है।
श्रेयसी (यशदाता) शिवा - कल्याण करने वाली।
2 द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी - ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वाली और स्वर को मधुर करने वाली है। इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है। 
यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी की आराधना करना चाहिए।
तृतीयं चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेती चतुर्थकम
3 तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर - नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है।
यह औषधि‍ मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए।
4 चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा - नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डा देवी की आराधना करना चाहिए।
पंचम स्कन्दमा‍तेति षष्ठमं कात्यायनीति च
5 पंचम स्कंदमाता यानि अलसी - नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है।
अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।
अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा
दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए।
6 षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया - नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है। इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करना चाहिए।
सप्तमं कालरात्रीति महागौ‍रीति चाष्टम
7 सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन - दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है। यह नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है।इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली ए
वं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।
8 अष्टम महागौरी यानि तुलसी - नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।

तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी महागौ
री शूलघ्‍नी देवदुन्दुभि:
तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।
मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।
इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता
9 नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी - नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी या शतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए।
इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करती है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए। 09926077010